क्या एतिकाफ करने वाले (मुतकिफ़) को जुमा की नमाज़ पढ़ने के लिए दूसरी मस्जिद जाते समय सर पर कपड़ा रखना ज़रूरी है?
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
اَلْجَوَابُ بِعَوْنِ الْمَلِكِ الْوَهَّابِ، اَللّٰهُمَّ هِدَايَةَ الْحَقِّ وَالصَّوَابِ۔
अगर ऐसी मस्जिद में एतिकाफ़ किया है, जहाँ जुमा की नमाज़ नहीं होती, तो जुमा अदा करने के लिए किसी दूसरी मस्जिद जाना मुतकिफ़ के लिए जायज़ है। जाते हुए रास्ते में सर पर कोई कपड़ा वगैरह रखना ज़रूरी नहीं। लेकिन आम हालात की तरह आने-जाने में भी बदनज़री, फुज़ूल नज़री (ग़ैर ज़रूरी इधर-उधर देखना) से बचना होगा। अगर रास्ते में बग़ैर शरई इजाज़त के किसी से खड़े होकर बात करने लगे, तो एतिकाफ़ टूट जाएगा।
जुमा की अदायगी के लिए अपनी एतिकाफ़गाह से इस तरह निकले कि ख़ुत्बा शुरू होने से पहले वहाँ पहुँचकर चार रकअत सुन्नत पढ़ सके और नमाज़-ए-जुमा के बाद इतनी देर तक रुके कि चार या छह रकअत नफ़्ल पढ़ सके। अगर इससे ज़्यादा ठहरा या बाकी एतिकाफ़ वहीं पूरा कर लिया, तब भी एतिकाफ़ नहीं टूटेगा। लेकिन नमाज़-ए-जुमा के बाद छह रकअत से ज़्यादा ठहरना मकरूह है।