सवाल: मैंने रोज़े के लिए सहरी की, सहरी के बाद दाँत साफ़ किए, फिर वुज़ू किया लेकिन रोज़े की नीयत करना भूल गया। और जब रोज़े का वक़्त ख़त्म होने के बाद अज़ान हो रही थी, तो रोज़े की नीयत की। क्या मेरा रोज़ा हो गया? بِسْمِ اللہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ اَلْجَوَابُ بِعَوْنِ الْمَلِکِ الْوَھَّابِ اَللّٰھُمَّ ھِدَایَۃَ الْحَقِّ وَالصَّوَابِ पूछी गई सूरत में आपका रोज़ा हो गया , क्योंकि रोज़े के लिए सहरी करना ही रोज़े की नीयत होता है। यानी अगर कोई शख़्स रोज़ा रखने के इरादे से सहरी कर ले और अलग से ज़बान से नीयत के अल्फ़ाज़ अदा न करे, तब भी उसका रोज़ा हो जाता है। चुनांचे मुफ़्ती अमजद अली आज़मी رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने बहार-ए-शरीअत में फ़रमाया: "सहरी खाना भी नीयत है, ख़्वाह रमज़ान के रोज़े के लिए हो या किसी और रोज़े के लिए।" ( बहार-ए-शरीअत, जिल्द 01, सफ़हा 969, मतबूआ मक्तबतुल मदीना, कराची )
सवाल: चोर बाजार से चीज़ें खरीदना कैसा? (व्हाट्सएप के ज़रिए सवाल) जवाब: अगर वाक़ई वहाँ चोरी किया हुआ माल बिक रहा हो तो इसका खरीदना हराम है, बल्कि अगर ज़न्न-ए-ग़ालिब भी हो कि ये चोरी का माल है तब भी इसे खरीदना नाजायज़ है। हो सकता है वहाँ चोरी किया हुआ माल ही बिकता हो, तभी तो इसको चोर बाजार कहा जा रहा है। आला हज़रत मौलाना शाह इमाम अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं: "चोरी का माल दानिस्ता (यानी जान-बूझ कर) खरीदना हराम है, बल्कि अगर मालूम न हो, मगर मज़नून (यानी मशकूक) हो तब भी हराम है।" (फतावा रज़विय्या, 17 / 165, रज़ा फाउंडेशन, मरकज़-उल-अवलिया, लाहौर)
सज्दा-ए-तिलावत न करने की सूरत में इसाल-ए-सवाब हो जाएगा? सवाल: अगर किसी ने पूरा क़ुरआन-ए-पाक पढ़ा लेकिन उसने सज्दा-ए-तिलावत नहीं किए , तो क्या क़ुरआन-ए-पाक पढ़ने का सवाब किसी को तोहफ़े में दे सकता है? (रुक्न-ए-शूरा का सवाल) जवाब: क़ुरआन-ए-पाक पढ़ने वाले पर जो सज्दे वाजिब हुए थे, वे अब भी बाक़ी हैं। उन्हें अदा करने का वक़्त उम्र भर है। अगर सज्दे कभी भी नहीं करेगा, तो गुनहगार होगा। (1) बहरहाल, ऐसी कोई रिवायत नहीं पढ़ी कि जब तक सज्दे न किए जाएँ तो उसको तिलावत का सवाब नहीं मिलेगा, लिहाज़ा जब उसको सवाब मिलेगा, तो इसाल-ए-सवाब भी कर सकता है। رد المحتار، کتاب الصلاة، باب سجود التلاوة، ۲ / ۷۰۳ ماخوذاً، دار المعرفة، بیروت
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